शुरुआती सवाल ₹548 करोड़ क्यों लगे?
जून 2025 में, Group Captain शुभांशु शुक्ला ने Axiom‑4 मिशन के जरिए अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) का सफर शुरू किया—इस सफर की कुल लागत लगभग ₹548 करोड़ है।
निश्चित रूप से यह आंकड़ा बहुत बड़ा है इसके पीछे क्या वजहें हैं? क्या यह महंगा खिलवाड़ था या ISRO और भारत के स्पेस सपनों का बुद्धिमतापूर्ण निवेश? आइये, गहराई से समझते हैं।

Axiom‑4 सीट और ट्रेनिंग क्यों जरूरी बनी?
ISRO का गगनयान सपना 2027 तक तीन भारतीयों को अंतरिक्ष में भेजने की योजना है। सौ प्रतिशत भारत की तकनीक पर उड़ान भरना असल लक्ष्य है। लेकिन सिमुलेटर की सीमाएं हैं — Hand-on flight experience की ज़रूरत थी ।
इसलिए Axiom‑4 में सीट खरीदी गई—इससे शुभांशु को वास्तविक परिस्थितियों में उड़ान, संचार और emergencies हैंडल करने का अनुभव मिला। इससे 2–3 Unmanned Test Flights की ज़रूरत टली, खर्च भी कम हुआ और समय बचा।
₹548 करोड़ में क्या-क्या शामिल था?
- सीट बुकिंग Axiom‑4 और Dragon Capsule
- ट्रेनिंग NASA/ISRO के संयुक्त प्रोग्राम में
- लॉजिस्टिक्स, stay, वीज़ा, quarantine समेत
- स्पेससूट, प्रयोग उपकरण, मेडिकल किट
- ISRO‑प्रायोजित 7 experiments की तैयारी और सामग्री
- अन्य NASA collaboration experiments, जो मिशन को वैज्ञानिक बनाते हैं।

ISS पर किये गए प्रयोग – देश के लिए क्या मायने रखते हैं?
ISS पर शुभांशु की 14 दिन की यात्रा में कुल 60 एक्सपेरिमेंट किए जायेंगें, जिनमें 7 खास ISRO‑प्रायोजित हैं :
- दृश्य परिवर्तन और cognition
- भोजन पाचन और शरीर पर प्रभाव (Digestion and Its Impact on human body)
- मांसपेशियों (Muscles) का डाटा
- नमूनों की ग्रोथ और जीन स्टडी (Samples growth and study of the genes)
- फोटोसिंथेसिस वाले माइक्रो ऑर्गेनिज्म
- Tardigrade (माइक्रोबायोलॉजिकल सर्वाइवल)
- स्पेस सूट, फूड हाईजीन और waste सिस्टम का परीक्षण
ये प्रयोग Gaganyaan के लिए जरूरी जीव‑वैज्ञानिक और तकनीकी तैयारियों का आधार बनेंगे।
गगनयान की तैयारी और तकनीकी लाभ
- Crew अनुभव: सिमुलेटर-छोड़ असल उड़ान में अनुभव
- Emergency handling: वास्तविक स्थितियाँ संभालना
- Microgravity पर शारीरिक अध्ययन: ISS का डेटा भविष्य के सुरक्षित मिशनों के लिए
- Food और waste management: जीवन रक्षा प्रणालियाँ बनाएँगी
- Data sharing with NASA: वैश्विक सहयोग मजबूत होगा
इसकी बदौलत, एक सीट ₹548 करोड़ में गगनयान मिशन के लिए फ्रूटफुल और तकनीकी रूप से लाभदायक मौके लेकर आ रही है।
खर्च बनाम लाभ
- यह लागत 2–3 unmanned flights जितनी बड़े खर्च से कम थी।
देश और दुनिया की प्रतिक्रिया
- Economic Times ने इसे “₹500 करोड़ + खर्च” बताया और गगनयान में यह अनुभव उपयोगी बताया।
- Business Today ने “₹548 करोड़ दांव पर लगने” की बात कही—NASA की देरी में पैसा अटका पर भारत ने संयम दिखाया।
- AInvest ने इसे “निवेश अवसर” बताया—ISRO के साथ भारत space economy में भूमिका निभा सकता है।
- Axiom-4 के माध्यम से यह मिशन भारत को अंतरराष्ट्रीय space governance में शामिल करता है, जो विकास की ओर इंगित करता है ।

भावनात्मक पहलू: गर्व और प्रेरणा
- ISS से शुभांशु का “Namaskar from space!” देशवासियों के दिलों को छू गया।
- “तितली की तरह उड़ना”, “खाना-पीना और हँसना भी चुनौती थी”—इन अनुभवों ने सबको गौरवान्वित किया।
- भारत का दूसरा अंतरिक्ष यात्री, जो ISS में ट्रेनिंग ले रहा है—इसने बच्चों और युवाओं को सपने देखने की प्रेरणा दी।
भविष्य
- Gaganyaan 2027: Crew ready, Flight systems clear, खर्च बचा
- भारत का अपना स्पेस स्टेशन (2035 तक): इन प्रयोगों का डाटा अहम होगा
- Space startups, biotechnology, satellite manufacturing—investment आकर्षित होंगे
- वैश्विक साझेदारियां, जैसे NASA, ESA, JAXA, ISRO कॉमन मिशन तैयार कर रहे हैं
₹548 करोड़ की लागत सीमित थी—लेकिन इसके लाभ महत्वपूर्ण और बहुआयामी हैं।
निष्कर्ष
भारत ने ₹548 करोड़ क्यों खर्च किया?
- यह सिर्फ पैसे का खर्च नहीं था, बल्कि यह भविष्य के बीज़ बोन जैसा था।
- इस सफ़र से मिले अनुभव, वास्तविक उड़ान, अंतरिक्ष-बायो डेटा, और वैज्ञानिक योगदान गगनयान के लिए ‘रियाल टाइम ट्रेनिंग’ साबित होगा।
- वैज्ञानिक प्रयोग, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, प्रेरणा—इनके बिना महंगी उड़ान व्यर्थ हो सकती थी।
- ट्रेंच, ISS और Axiom‑4 के जरिये भारत ने अंतरिक्ष यात्रा में कदमताल करना सिखा—₹548 करोड़ की कीमत पर देश को अनेकों फायदे मिलेंगें।
यहाँ पर ब्लॉग का हेडलाइन बड़ा साफ जवाब सा है – हाँ, यह लागत वाजिब थी—क्योंकि यह निवेश नहीं, विकास था।
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