सोना, एक ऐसा शब्द जो सदियों से मानव सभ्यता को आकर्षित करता रहा है। यह सिर्फ एक धातु नहीं, बल्कि धन, शक्ति और सुंदरता का प्रतीक है। लेकिन इस सुनहरी चमक के पीछे एक स्याह सच छिपा है – सोने की खुदाई, जिसे खनन (Mining) कहा जाता है, हमारे पर्यावरण के लिए सबसे विनाशकारी गतिविधियों में से एक है। नदियों में ज़हर घुलता है, जंगल कटते हैं, और धरती के सीने पर गहरे ज़ख्म बनते हैं।
लेकिन क्या हो अगर आपको बताया जाए कि विज्ञान ने एक ऐसा नन्हा ‘जीव’ खोज लिया है, जो इस सारी बर्बादी को रोके बिना, चुपचाप और टिकाऊ तरीके से सोना बना सकता है? जी हाँ, वैज्ञानिकों ने एक ऐसे बैक्टीरिया की खोज की है, जिसका नाम है ‘कप्रीएविडस मेटालिड्यूरन्स’ (Cupriavidus metallidurans), और यह बैक्टीरिया सचमुच जहरीली मिट्टी को खाकर अपने शरीर से शुद्ध 24 कैरेट सोना बाहर निकालता है! यह किसी कल्पना से कम नहीं लगता, लेकिन यह विज्ञान की एक अद्भुत हकीकत है, जो सोने के खनन के तरीके को हमेशा के लिए बदलने का माद्दा रखती है।

जानिए ‘कप्रीएविडस मेटालिड्यूरन्स’ को
यह कोई नई खोज नहीं है कि कुछ बैक्टीरिया धातुओं के साथ क्रिया करते हैं। लेकिन ‘कप्रीएविडस मेटालिड्यूरन्स’ की कहानी कुछ अलग ही है। इस बैक्टीरिया को पहली बार बेल्जियम में एक धातु प्रसंस्करण कारखाने (Metal Processing Factory) के कीचड़ में खोजा गया था। वैज्ञानिकों ने पाया कि यह बैक्टीरिया ऐसे ज़हरीले वातावरण में भी जीवित रह सकता है जहाँ अधिकांश जीव तुरंत मर जाएंगे। इसके अंदर भारी
धातुओं, जैसे तांबा और सोना, के प्रति एक अविश्वसनीय प्रतिरोध (Resistance) होता है।
मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी (Michigan State University) के वैज्ञानिक काज़िम काशेफ़ी (Kazem Kashefi) और एडम ब्राउन (Adam Brown) ने इस बैक्टीरिया की इस असाधारण क्षमता को उजागर किया। उन्होंने पाया

कि यह बैक्टीरिया, जब गोल्ड क्लोराइड (Gold Chloride) जैसे अत्यधिक ज़हरीले सोने के यौगिकों (Gold Compounds) के संपर्क में आता है, तो एक अद्भुत रासायनिक प्रक्रिया शुरू करता है। दरअसल, गोल्ड क्लोराइड एक ऐसा तरल सोना है जो अधिकांश जीवों के लिए प्राणघातक होता है। लेकिन ‘कप्रीएविडस मेटालिड्यूरन्स’ के लिए यह भोजन है!
वैज्ञानिकों ने पाया कि यह बैक्टीरिया लगभग एक हफ्ते में इस जहरीले तरल सोने को खाकर, उसे अपने अंदर शुद्ध 24 कैरेट सोने के नगेट (Nuggets) में बदल देता है। काशेफ़ी इसे ‘माइक्रोबियल कीमिया’ (Microbial Alchemy) कहते हैं – यानी सूक्ष्मजीवों द्वारा कीमियागिरी, जहाँ एक हानिकारक पदार्थ को बहुमूल्य धातु में बदल दिया जाता है। यह खोज इतनी अद्भुत थी कि एडम ब्राउन ने इसे ‘द ग्रेट वर्क ऑफ़ द मेटल लवर’ (The Great Work of the Metal Lover) नामक एक कला इंस्टॉलेशन (Art Installation) के रूप में भी प्रदर्शित किया, जिसमें दर्शकों के सामने बैक्टीरिया को सोना बनाते हुए दिखाया गया।
कैसे काम करता है यह?
अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह नन्हा सा बैक्टीरिया इतना अविश्वसनीय काम कैसे करता है? इसके पीछे एक जटिल, लेकिन वैज्ञानिक प्रक्रिया है। ‘कप्रीएविडस मेटालिड्यूरन्स’ जहरीले, धातु-समृद्ध वातावरण में पनपने के लिए प्राकृतिक रूप से अनुकूलित (Adapted) है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसके पास ऐसे विशेष एंजाइम (Enzymes) होते हैं जो धातुओं को उसके सेल (Cell) के अंदर नियंत्रित और विषहरण (Detoxify) करते हैं।
जर्मनी के मार्टिन लूथर यूनिवर्सिटी (Martin Luther University) में आणविक सूक्ष्म जीवविज्ञानी (Molecular Microbiologist) डायट्रिच नीस (Dietrich Nies) के नेतृत्व में हुए शोध ने इस प्रक्रिया को और भी गहराई से समझाया है। जब गोल्ड आयन (Gold Ions) बैक्टीरिया के अंदर प्रवेश करते हैं, तो वे इसके सामान्य कामकाज को बाधित करते हैं। इससे निपटने के लिए, बैक्टीरिया एक एंजाइम, जिसे कॉपए (CopA) कहते हैं, का उपयोग करता है। यह एंजाइम सोने और तांबे दोनों के आयनों से इलेक्ट्रॉनों को हटाता है, जिससे वे अस्थिर और जहरीले रूप से स्थिर, धात्विक सोने के कणों (Metallic Gold Particles) में बदल जाते हैं।
ये सोने के कण बैक्टीरिया की कोशिकाओं के बाहर, लेकिन उसकी झिल्ली (Membrane) के भीतर एक सुरक्षात्मक क्षेत्र में फंस जाते हैं। जैसे-जैसे धात्विक सोना बनता है, बैक्टीरिया की बाहरी झिल्ली टूट जाती है, और सोने के नन्हे नगेट बाहर निकल जाते हैं। ये नगेट माइक्रोमीटर (Micrometers) जितने छोटे होते हैं, लेकिन समय के साथ ये बड़े कणों में एकत्रित हो सकते हैं, जैसे रेत के दाने। यह एक प्राकृतिक विषहरण और सोना पुनर्प्राप्ति (Gold Recovery) प्रक्रिया है।
सोने के खनन का क्रूर सच
पारंपरिक सोने का खनन एक बेहद विनाशकारी प्रक्रिया है। कल्पना कीजिए, एक सोने की अंगूठी बनाने के लिए 20 टन से अधिक अपशिष्ट (Waste) उत्पन्न होता है! इस प्रक्रिया में अक्सर अत्यधिक जहरीले रसायनों जैसे साइनाइड (Cyanide) और पारे (Mercury) का उपयोग किया जाता है, जो जल स्रोतों (Water Sources), मिट्टी और हवा को गंभीर रूप से प्रदूषित करते हैं। खनन स्थल अक्सर विशाल, जहरीले गड्ढों और कचरे के ढेर में बदल जाते हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) नष्ट हो जाते हैं और स्थानीय समुदायों का स्वास्थ्य खतरे में पड़ जाता है। इन रसायनों से होने वाला प्रदूषण पीढ़ियों तक इंसानों और जानवरों को बीमार करता रहता है।
ऐसे में, ‘कप्रीएविडस मेटालिड्यूरन्स’ की खोज ‘बायो-माइनिंग’ (Bio-mining) या ‘जैव-खनन’ की दिशा में एक बड़ी उम्मीद है। इस बैक्टीरिया की मदद से सोना निकालने का तरीका कम प्रदूषणकारी, अधिक सस्ता और टिकाऊ (Sustainable) हो सकता है। यह पारंपरिक तरीकों की तुलना में पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाएगा और श्रमिकों के लिए भी सुरक्षित होगा। यह ‘ग्रीन गोल्ड’ (Green Gold) निकालने का एक तरीका हो सकता है, जिससे पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सके।
कचरे से सोना
इस बैक्टीरिया की क्षमता सिर्फ नई खदानों से सोना निकालने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘शहरी खनन’ (Urban Mining) के क्षेत्र में भी क्रांति ला सकता है। आज की डिजिटल दुनिया में, इलेक्ट्रॉनिक कचरा (Electronic Waste – E-Waste) एक बड़ी चुनौती बन गया है। पुराने मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में सोने, चांदी और तांबे जैसी बहुमूल्य धातुएं होती हैं। पारंपरिक रूप से इन्हें रीसायकल करना महंगा और प्रदूषणकारी होता है।
‘कप्रीएविडस मेटालिड्यूरन्स’ की मदद से ई-कचरे से भी सोना निकाला जा सकता है। यह बैक्टीरिया उन जहरीले धातुओं को पचाकर सोने में बदल सकता है, जिससे न केवल बहुमूल्य धातुएं पुनः प्राप्त होंगी, बल्कि पर्यावरण के लिए हानिकारक कचरे का भी सुरक्षित तरीके से निपटान होगा। इसके अलावा, यह खदानों से बचे हुए अवशेषों (Mining Tailings) से भी सोना निकालने में मदद कर सकता है, जहाँ सोने की थोड़ी मात्रा अभी भी बची होती है लेकिन पारंपरिक तरीकों से उसे निकालना आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं होता। यह ‘जीरो वेस्ट’ (Zero Waste) और ‘सर्कुलर इकॉनमी’ (Circular Economy) के सिद्धांतों को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है।
चुनौतियां और भविष्य की राह
हालांकि ‘कप्रीएविडस मेटालिड्यूरन्स’ की खोज बेहद रोमांचक है, लेकिन इसे बड़े पैमाने पर औद्योगिक स्तर पर लागू करने में अभी भी कई चुनौतियां हैं।
- पैमाना और दक्षता – क्या यह प्रक्रिया इतनी कारगर है कि बड़े पैमाने पर सोने की मांग को पूरा कर सके? लाखों टन मिट्टी से सोना निकालने के लिए कितने बैक्टीरिया और कितनी सुविधाएं चाहिए होंगी?
- लागत – हालांकि यह प्रदूषण कम करता है, लेकिन क्या इसकी उत्पादन लागत पारंपरिक खनन से कम होगी, खासकर बड़े पैमाने पर?
- समय – बैक्टीरिया को सोना बनाने में एक हफ्ता लगता है। औद्योगिक उत्पादन के लिए क्या यह गति पर्याप्त होगी?
- तकनीकी बाधाएं – बैक्टीरिया को नियंत्रित वातावरण में पैदा करना, उन्हें खिलाना और फिर उनसे सोना निकालना – इन सभी चरणों में कई तकनीकी बाधाएं आ सकती हैं।
वैज्ञानिक अभी भी इस प्रक्रिया को समझने और इसे अधिक कुशल बनाने पर काम कर रहे हैं। मार्टिन लूथर यूनिवर्सिटी के डायट्रिच नीस और उनकी टीम इस बैक्टीरिया की आनुवंशिक प्रतिक्रियाओं (Genetic Responses) का अध्ययन कर रही है ताकि सोने के बायोजियोकेमिकल चक्र (Biogeochemical Cycle) को बेहतर ढंग से समझा जा सके और बायोसेंसर (Biosensors) तथा बायोप्रोसेसिंग (Bioprocessing) उपकरण विकसित किए जा सकें।
यदि ये चुनौतियां दूर हो जाती हैं, तो ‘कप्रीएविडस मेटालिड्यूरन्स’ केवल सोने के खनन को ही नहीं, बल्कि प्रदूषित स्थलों की सफाई (Bioremediation) और अन्य बहुमूल्य धातुओं की पुनर्प्राप्ति में भी क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। यह प्रकृति की अविश्वसनीय शक्ति का एक प्रमाण है और यह दिखाता है कि कैसे सूक्ष्मजीव मानव जाति की सबसे बड़ी चुनौतियों को हल करने में मदद कर सकते हैं।
एक सुनहरे भविष्य की ओर?
सोना हमेशा मूल्यवान रहेगा, लेकिन इसे प्राप्त करने का तरीका बदल सकता है। ‘कप्रीएविडस मेटालिड्यूरन्स’ हमें एक ऐसे भविष्य की ओर ले जा रहा है जहां सोना सिर्फ धरती के गर्भ से नहीं, बल्कि सूक्ष्मजीवों के ‘पेट’ से निकलेगा – एक ऐसा सोना जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना प्राप्त किया जाएगा। यह विज्ञान और प्रकृति का एक अद्भुत मेल है, जो हमें पर्यावरण के प्रति अधिक जागरूक और टिकाऊ समाधानों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
यह केवल एक बैक्टीरिया की कहानी नहीं, बल्कि मानव नवाचार और प्रकृति की अंतहीन संभावनाओं की कहानी है। क्या पता, कल को हमारी अलमारियों में रखा सोना किसी बड़ी खदान से नहीं, बल्कि एक नन्हे से बैक्टीरिया के ‘जादुई’ काम का नतीजा हो!
