जनरल

केरल में क्यों पसरा दहशत, क्या है यह जानलेवा खतरा और इससे कैसे बचें

‘ब्रेन-ईटिंग अमीबा’ का खौफ फिर लौटा

मानसून का मौसम, दक्षिण भारत की हरियाली, तालाबों और नदियों में बहता पानी… यह सब खूबसूरती का एक ऐसा मंजर पेश करता है, जो हर किसी को अपनी तरफ खींचता है। लेकिन, हाल ही में केरल से आई एक खबर ने इस खूबसूरती के पीछे छिपे एक जानलेवा खतरे की तरफ सबका ध्यान खींचा है। राज्य में ‘ब्रेन-ईटिंग अमीबा’ (दिमाग खाने वाले अमीबा) के संक्रमण से एक और बच्ची की मौत हो गई है। यह कोई आम संक्रमण नहीं है, बल्कि एक बेहद दुर्लभ और लगभग 100% घातक बीमारी है, जिसने एक बार फिर लोगों के मन में डर पैदा कर दिया है।

यह खबर सिर्फ केरल के लिए नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए एक चेतावनी है। यह हमें प्रकृति में मौजूद उन सूक्ष्म जीवों के बारे में सोचने पर मजबूर करती है, जो हमारी आंखों से भले ही ओझल हों, लेकिन हमारी जान के लिए एक बड़ा खतरा बन सकते हैं। इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि यह ‘दिमाग खाने वाला अमीबा’ आखिर है क्या, यह कैसे हमला करता है, इसके लक्षण क्या हैं, और सबसे ज़रूरी बात, हम इससे खुद को कैसे बचा सकते हैं।

Courtesy – Science News Explores

 

एक कोशिका वाला जीव जो बन सकता है मौत की वजह

जिस सूक्ष्म जीव के बारे में हम बात कर रहे हैं, उसका वैज्ञानिक नाम ‘नैगलेरिया फाउलेरी’ (Naegleria fowleri) है। यह एक कोशिका वाला जीव है, जिसे आम भाषा में अमीबा कहा जाता है। यह जीव आमतौर पर गर्म और ताजे पानी के जलाशयों, जैसे कि झील, नदी, तालाब, नहर और गर्म झरनों में पाया जाता है। इसे ‘ब्रेन-ईटिंग अमीबा’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह इंसान के दिमाग को संक्रमित कर उसे धीरे-धीरे खत्म कर देता है।

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यह अमीबा, अगर गलती से पी लिया जाए तो, हमारे लिए हानिकारक नहीं होता। हमारा पेट इसे आसानी से पचा लेता है। लेकिन, जब यह किसी तरह हमारी नाक के रास्ते से शरीर में प्रवेश करता है, तब यह अपना घातक रूप दिखाता है।

यह अमीबा नाक की म्यूकोसा (mucosa) से होकर गुजरता है और सीधे सूंघने वाली तंत्रिका (olfactory nerve) के जरिए हमारे दिमाग तक पहुंच जाता है। एक बार दिमाग में पहुंचने के बाद, यह भयानक रूप से अपनी संख्या बढ़ाता है और दिमाग के टिश्यूज को खाना शुरू कर देता है। यही वजह है कि यह संक्रमण इतना घातक है।

प्राइमरी अमीबिक मेनिंगोएन्सेफलाइटिस (PAM) 

नैगलेरिया फाउलेरी द्वारा पैदा की जाने वाली बीमारी को प्राइमरी अमीबिक मेनिंगोएन्सेफलाइटिस (Primary Amebic Meningoencephalitis- PAM) कहा जाता है। यह एक बेहद दुर्लभ बीमारी है, जिसका मतलब है कि इसके मामले बहुत कम देखने को मिलते हैं। लेकिन, इसकी दुर्लभता के साथ-साथ इसकी घातकता भी जुड़ी हुई है। इस बीमारी में मृत्यु दर 97% से अधिक है। यानी, अगर किसी को यह संक्रमण हो जाता है, तो उसके बचने की संभावना न के बराबर होती है।

बीमारी के लक्षण – संक्रमण के बाद लक्षण बहुत तेजी से सामने आते हैं, आमतौर पर 1 से 12 दिनों के भीतर। इन्हें दो चरणों में समझा जा सकता है:

पहला चरण (शुरुआती लक्षण):

  • तेज सिरदर्द
  • तेज बुखार
  • जी मिचलाना और उल्टी
  • गर्दन में अकड़न

दूसरा चरण (गंभीर लक्षण) – जैसे-जैसे अमीबा दिमाग में अपनी संख्या बढ़ाता है, लक्षण और भी गंभीर हो जाते हैं:

  • भ्रम या मतिभ्रम (hallucinations)
  • संतुलन खोना
  • दौरे पड़ना (seizures)
  • सुगंध और स्वाद का खत्म हो जाना
  • अंत में, मरीज कोमा में चला जाता है और कुछ ही दिनों में उसकी मौत हो जाती है।

इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती लक्षण आम वायरल या बैक्टीरियल इंफेक्शन जैसे लगते हैं, जिससे डॉक्टर अक्सर सही समय पर इसका निदान नहीं कर पाते। और जब तक सही पहचान होती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

क्यों बढ़ रहा है खतरा?

नैगलेरिया फाउलेरी का संक्रमण सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। इसके मामले दुनिया भर में, खासकर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान और मेक्सिको जैसे देशों में सामने आए हैं।

भारत में भी इसके पहले मामले सामने आ चुके हैं। केरल में 2016 में, 2017 में और 2019 में भी इसके मामले रिपोर्ट किए गए थे। हाल ही में केरल के अलापुझा जिले में हुई मौत ने एक बार फिर इस खतरे को सामने ला दिया है। यह दिखाता है कि यह जीव भारत के ताजे पानी के जलाशयों में मौजूद है, और अगर हम सावधान नहीं रहे, तो खतरा बढ़ सकता है।

सवाल यह उठता है कि यह खतरा क्यों बढ़ रहा है? इसका सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और बढ़ते वैश्विक तापमान (Global Warming) से है। नैगलेरिया फाउलेरी गर्म और ताजे पानी में सबसे ज्यादा पनपता है। जब तापमान बढ़ता है, तो पानी का तापमान भी बढ़ जाता है, जिससे इस अमीबा को पनपने के लिए और भी अनुकूल परिस्थितियां मिलती हैं। इसके अलावा, प्रदूषित और स्थिर पानी (Stagnant Water) भी इसके लिए एक आदर्श प्रजनन स्थल बन जाता है।

यह एक गंभीर चेतावनी है कि हमें अपने जल संसाधनों की सफाई और रखरखाव पर ध्यान देने की ज़रूरत है।

क्या करें और क्या न करें?

PAM बीमारी का कोई प्रभावी इलाज नहीं है, इसलिए बचाव ही सबसे बड़ा उपाय है। चूंकि यह बीमारी बहुत तेजी से फैलती है और जानलेवा है, इसलिए हमें कुछ आसान लेकिन महत्वपूर्ण सावधानियां बरतनी चाहिए।

  1. नाक से पानी जाने से रोकें: यह सबसे महत्वपूर्ण उपाय है। जब भी आप किसी गर्म या गंदे पानी के तालाब, झील, या नदी में नहा रहे हों, तो अपनी नाक में पानी जाने से रोकें। आप नाक बंद करने वाले क्लिप (nose clips) का इस्तेमाल कर सकते हैं।
  2. गर्म और गंदे पानी से बचें: ऐसे तालाबों, झीलों या नहरों में नहाने या गोता लगाने से बचें, जिनका पानी गर्म और स्थिर हो। खासकर गर्मियों के दिनों में, जब पानी का तापमान बढ़ जाता है, तो ऐसे जलाशयों में जाने से बचें।
  3. नाली के पानी से दूर रहें: घर के आसपास गंदे या स्थिर पानी को जमा न होने दें। अगर आप किसी गंदी नाली या तालाब के पास से गुजर रहे हैं, तो सावधान रहें।
  4. व्यक्ति से नहीं फैलता: यह जानना भी ज़रूरी है कि यह बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलती। इसलिए, घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, इस बीमारी के इलाज के लिए एक दवा ‘मिल्टेफोसिन’ (Miltefosine) का उपयोग किया जाता है, लेकिन यह भी हमेशा प्रभावी नहीं होती। समय पर निदान की कमी और बीमारी का तेज फैलना, इलाज को और भी मुश्किल बना देता है।

अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रकृति में मौजूद हर चीज का सम्मान करना और उससे जुड़े खतरों को समझना बेहद ज़रूरी है। ‘दिमाग खाने वाला अमीबा’ एक डरावना नाम हो सकता है, लेकिन अगर हम सावधानियां बरतें और जागरूक रहें, तो इस दुर्लभ और घातक खतरे से खुद को और अपने प्रियजनों को सुरक्षित रख सकते हैं।


Source – Dainik Bhaskar

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