GST की नई योजना – क्यों चर्चा में है यह प्रस्ताव?
केंद्र सरकार इन दिनों एक महत्वपूर्ण आर्थिक पहल पर विचार कर रही है जो सीधे मध्य और निम्न मध्यम वर्ग को लाभ पहुंचा सकती है। यह पहल है—GST की मौजूदा चार-स्तरीय प्रणाली (5%, 12%, 18%, 28%) का 12% स्लैब हटाकर उसमें शामिल घरेलू वस्तुओं को 5% में लाने का प्रस्ताव। इसमें ऐसे बहुत-से रोज़मर्रा के उपयोगी आइटम—टूथपेस्ट, किचन के बर्तन, छोटे घरेलू उपकरण, कपड़े और जूते शामिल हैं। इस परिवर्तन से इन वस्तुओं की कीमतों में स्पष्ट कमी आ सकती है, जो आम उपभोक्ता की जेब को सीधे राहत देगी।

कौन-कौन सी वस्तुएँ होंगी सस्ती?
सरकारी मसौदे के अनुसार, इनमें शामिल वस्तुऐं हैं:
- टूथपेस्ट, टूथ पाउडर
- छाता, सिलाई मशीन
- प्रेशर कुकर, किचन यूटेंसिल्स
- इलेक्ट्रिक आइरन, गीजर, छोटे वाशिंग मशीन
- साइकल
- ₹1,000 से ₹11000 तक के रेडीमेड कपड़े
- ₹500 से ₹1,000 तक के जूते
- स्टेशनरी आइटम्स (जैसे जियोमेट्री बॉक्स, एक्सरसाइज बुक)
- जरूरी स्वास्थ्य सामग्री (वैक्सीन और टेस्ट किट्स)
- सिरेमिक टाइल्स, कृषि उपकरण और कुछ घरेलू उपकरण।
इन वस्तुओं का 12% GST से 5% कम कर देना, खरीदारी का कुल खर्च काफी हद तक कम कर सकता है।
सरकार का तर्क और राजस्व पर प्रभाव
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि यह कदम एक “स्थिर और अधिक तर्कसंगत GST संरचना” की ओर बड़ा कदम है। सरकार मानती है कि यह वृद्धि आकर्षित करेगी और अंततः GST संग्रह में वृद्धि होगी क्योंकि अधिक लोग सामान खरीदने में सक्षम होंगे।
राजस्व के लिहाज़ से शुरुआती सालों में सरकार को ₹40,000 करोड़ से ₹50,000 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ सकता है। लेकिन सरकार इसे एक दीर्घकालिक (long-term) निवेश मानती है, क्योंकि इससे होलसेल कंजम्पशन बढ़ेगा और GST का क्षेत्र भी बड़ा होगा।
राज्य सरकारों का रवैया
GST व्यवस्था में यह बदलाव तभी मुमकिन है जब GST काउंसिल (जिसमें केंद्र और सभी राज्य शामिल होते हैं) का सभी राज्यों से अनुमति मिलती है। फिलहाल इस प्रस्ताव को लेकर पंजाब, केरल, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्यों ने आपत्ति जतायी है—वे कहते हैं कि इससे उनकी राजस्व हिस्सेदारी पर असर पड़ेगा । फैसले के लिए आगे मौका आएगा — 56वीं GST काउंसिल की मीटिंग, जिसे इस महीने बुलाया जा सकता है।
आम आदमी की जेब से जुड़ी समस्या
मौजूदा समय में, कम महंगाई और ठहराव की स्थिति के बीच मध्य वर्ग की ख़रीददारी लगातार गिर रही है। रसोई—बाथरूम से लेकर स्कूल और ऑफिस तक—हर ज़रूरी सामान का खर्च बहुत बड़ा हो गया है।
दो माह पहले ही सरकार ने ₹12 लाख तक आय वालों के आयकर निर्धारण में राहत दी थी। उसी के बाद अब यह नया कदम बहुत-लोगों की पॉकेट पर असर डाल सकता है।
GST स्लैब का पुनर्गठन दामों को काबू में लाने का एक ज़रिया है—यह हर महीने के ग्रॉस खर्च को कम कर सकता है और घरेलू बजट को संतुलित बनाने में मदद करेगा।
राजनैतिक रुख और बहस का स्वरूप
पिछले कुछ समय से GST को लेकर बहुत राजनीतिक बहस हो रही है। विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं कि क्या केंद्र इस कदम से लोकप्रियता पाने की कोशिश कर रहा है, जबकि मंथली संग्रह में कमी आएगी? साथ ही वे यह भी कहते हैं: “क्या राज्यों की राय का इमानदार सम्मान किया जा रहा है?”
लेकिन केंद्र का कहना है कि यह टैक्स स्ट्रक्चर में सुधार है न कि लोकलुभावन कदम।
अगर 12% स्लैब पूरी तरह हट गया तो क्या होगा?
यह बदलाव एक बड़ा संकेत होगा—GST प्रणाली में यह अब तक का सबसे बड़ा पुनर्गठन होगा, क्योंकि इसे लागू करने के लिए दो स्लैबों का मिलान करना होगा:
- कई वस्तुओं को 5% में लाया जाना
- कुछ अपरिहार्य या लग्ज़री आइटमों को 18% या 28% में रखना
इससे, वैसे उत्पाद जिनकी मांग स्थिर है, उन्हें प्रतियोगी कीमतों में बेचना आसान होगा। पूरा सिस्टम सरल और पारदर्शी होगा।
भविष्य का अनुमान
सरकार का मानना है कि कम कीमतें खरीदारी को प्रोत्साहित करेंगी, जिससे GST आधारित राजस्व बढ़ेगा।
लेकिन वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि यह मानना भी जरूरी है कि पिछले तीन-चार साल में GST संग्रह रिकॉर्ड स्तर पर था, इसलिए ऐसे बदलाव लोकलुभावन लग सकते हैं।
वैश्विक आर्थिक मंदी को देखते हुए, कम कीमतें ग्रॉस कंजम्पशन को मजबूती दे सकती हैं, लेकिन केवल तभी जब साथ में रोजगार और दाम स्थिर हों।
क्या सच में मिलेगा गरीब और मध्यम वर्ग को फायदा?
इस पूरी कहानी का मूल भाव यही है कि मध्यम वर्ग को मदद चाहिए, और यह कदम उसकी तरफ एक संकेत हो सकता है।
यदि यह बदलाव लागू होता है, तो कपड़े की खरीद से लेकर टूथब्रश और किचन के सामान तक—ग्राहकों की जेब में पैसे होंगें। बाक़ी यह निर्भर करेगा GST काउंसिल की बैठक पर, और राज्यों के समर्थन पर।
