ग्रेट निकोबार द्वीप, जो अपनी रणनीतिक स्थिति और समृद्ध जैव-विविधता के लिए जाना जाता है, अब भारत के भविष्य के विकास का केंद्र बनने जा रहा है। सरकार की महत्वाकांक्षी ग्रेट निकोबार मेगा-इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजना, जिसे ₹72,000 करोड़ की लागत से लागू किया जा रहा है, न केवल इस दूरस्थ द्वीप को एक वैश्विक व्यापार और रसद केंद्र के रूप में स्थापित करेगी, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए भी एक मील का पत्थर साबित होगी। यह परियोजना एक प्रगतिशील दृष्टिकोण का प्रमाण है, जो चुनौतियों का सामना करते हुए देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का वादा करती है।

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राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक महत्व
ग्रेट निकोबार परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका रणनीतिक महत्व है। यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) के निकट स्थित है, जो हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण शिपिंग मार्ग है। इस परियोजना के तहत निर्मित होने वाला अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रांस-शिपमेंट टर्मिनल (ICTT) और एक नागरिक-सैन्य हवाई अड्डा, भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति को मजबूती देगा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में इसकी उपस्थिति को सुदृढ़ करेगा।
- चीन के प्रभाव का मुकाबला – हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक गतिविधियों के मद्देनजर, यह परियोजना भारत को एक मजबूत प्रतिरोधी क्षमता प्रदान करेगी। हवाई अड्डे से भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना की तैनाती में तेजी आएगी, जिससे चीनी नौसैनिक गतिविधियों की निगरानी में भारत की क्षमता मजबूत होगी।
- सुरक्षित व्यापार मार्ग – यह टर्मिनल भारत को अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग कॉरिडोर पर एक प्रमुख खिलाड़ी बनाएगा, जिससे समुद्री व्यापार पर नियंत्रण बढ़ेगा और आयात-निर्यात को गति मिलेगी।
आर्थिक विकास और रोजगार के अवसर
यह परियोजना सिर्फ एक रक्षा पहल नहीं है, बल्कि यह एक विशाल आर्थिक इंजन भी है। इसका उद्देश्य भारत को एक वैश्विक लॉजिस्टिक्स हब के रूप में स्थापित करना है।
- ट्रांस-शिपमेंट हब – वर्तमान में, भारत का अधिकांश ट्रांस-शिपमेंट कार्गो सिंगापुर, कोलंबो और पोर्ट क्लैंग जैसे विदेशी बंदरगाहों से होकर गुजरता है। इस परियोजना से भारत को सालाना लगभग ₹3,000 से ₹4,500 करोड़ का राजस्व प्राप्त हो सकता है, जो विदेशी बंदरगाहों को जाता है।
- रोजगार सृजन – यह परियोजना प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करेगी। पोर्ट, हवाई अड्डे और टाउनशिप के निर्माण और संचालन से स्थानीय आबादी के लिए नौकरी के अवसर खुलेंगे। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में सुधार होगा।
आत्मनिर्भर भारत – यह परियोजना ‘आत्मनिर्भर भारत’ के दृष्टिकोण के अनुरूप है, जो देश को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक मजबूत स्थिति बनाने पर केंद्रित है।

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पर्यावरणीय संतुलन और जनजातीय कल्याण
परियोजना के आलोचकों ने पर्यावरण और आदिवासियों पर इसके प्रभाव को लेकर चिंताएं व्यक्त की हैं। हालांकि, सरकार ने इन चिंताओं को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए हैं।
- पर्यावरण सुरक्षा – पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने परियोजना को सशर्त मंजूरी दी है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि 65.99 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र को ‘हरित विकास’ के लिए आरक्षित किया गया है, जहाँ पेड़ों को नहीं काटा जाएगा। इसके अलावा, वन्यजीवों और वनस्पतियों के संरक्षण के लिए पर्याप्त शमन उपाय (mitigation measures) किए जा रहे हैं।
- वैज्ञानिक अध्ययन – भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) और सलीम अली पक्षीविज्ञान और प्राकृतिक इतिहास केंद्र (SACON) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों ने परियोजना का मूल्यांकन किया है। उनकी रिपोर्टों के अनुसार, आवश्यक सुरक्षा और संरक्षण उपायों के साथ परियोजना को लागू किया जा सकता है।
- वन अधिकार और पुनर्वास – सरकार ने जनजातीय समुदायों के कल्याण के लिए कई प्रावधान किए हैं। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) के सदस्यों ने भी यह कहा है कि आदिवासी समुदाय विकास के विरोध में नहीं हैं, बल्कि उन्हें बेहतर परिवहन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की आवश्यकता है। सरकार ने यह सुनिश्चित करने का संकल्प लिया है कि किसी भी प्रकार का विस्थापन न्यूनतम हो और प्रभावित समुदायों को उचित मुआवजा, आजीविका सहायता और कौशल विकास प्रदान किया जाए।
कांग्रेस पार्टी का दृष्टिकोण
इस परियोजना के आलोचकों में कांग्रेस पार्टी के नेता भी शामिल हैं, जिन्होंने इस पर गंभीर चिंताएँ व्यक्त की हैं। कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने इस परियोजना को ‘सुनियोजित दुस्साहस’ बताया है। उन्होंने तर्क दिया है कि यह परियोजना न केवल द्वीप के मूल आदिवासी समुदायों के अस्तित्व के लिए खतरा है, बल्कि यह क्षेत्र के अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी भारी नुकसान पहुँचा सकती है।

- जनजातीय समुदायों पर खतरा – सोनिया गांधी ने विशेष रूप से निकोबारी और शोम्पेन जनजातियों पर परियोजना के संभावित प्रभाव को उजागर किया है। उन्होंने कहा कि निकोबारी आदिवासियों के पैतृक गाँव परियोजना के प्रस्तावित क्षेत्र में आते हैं, और शोम्पेन जनजाति, एक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG), को और भी बड़े खतरे का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि परियोजना उनके आरक्षित क्षेत्रों के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करती है।
- पर्यावरणीय विनाश और कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी – उन्होंने आरोप लगाया कि इस परियोजना के लिए लाखों पेड़ों की कटाई की जाएगी, और सरकार द्वारा हरियाणा जैसे दूर के राज्य में ‘प्रतिपूरक वनीकरण’ का वादा पारिस्थितिकी रूप से भिन्न होने के कारण मूल वर्षावन के नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता। सोनिया गांधी ने यह भी कहा कि सरकार ने संवैधानिक और कानूनी निकायों को दरकिनार किया है, और आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक परामर्श नहीं किया गया।
- जोखिम और सुरक्षा – सोनिया गांधी ने इस बात पर भी जोर दिया कि यह द्वीप भूकंप और सुनामी के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, और ऐसे क्षेत्र में इतनी बड़ी परियोजना का निर्माण एक बड़ा जोखिम है।
निष्कर्ष
ग्रेट निकोबार परियोजना एक दूरदर्शितापूर्ण कदम है जो भारत को एक विकसित और सशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ा रहा है। यह विकास, सुरक्षा और प्रगति का एक अनूठा संगम है। जबकि विकास के रास्ते में कुछ चुनौतियां हो सकती हैं, सरकार ने इन पर काबू पाने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई है। यह परियोजना न केवल भारत के आर्थिक और रणनीतिक लक्ष्यों को पूरा करेगी, बल्कि यह स्थानीय समुदायों के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव लाएगी, जिससे यह सही मायनों में एक जन-केंद्रित विकास का उदाहरण बन जाएगी।
