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कौन हैं सीपी राधाकृष्णन और क्यों हैं वो उपराष्ट्रपति पद के सबसे उपयुक्त उम्मीदवार

सियासत का नया दांव जब दिल्ली के गलियारों में गूंजा एक नया नाम

रविवार की शाम, दिल्ली के सियासी गलियारों में एक नाम गूंजा, जिसने अचानक पूरे देश का ध्यान खींच लिया। वो नाम था- सी.पी. राधाकृष्णन। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने जब एनडीए की तरफ से उन्हें उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया, तो यह सिर्फ एक औपचारिक घोषणा नहीं थी। यह एक सुनियोजित और दूरगामी रणनीति का हिस्सा था, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी नेतृत्व के ‘नए भारत’ के राजनीतिक समीकरणों को साधने की सोच को दर्शाती है।

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक ऐसे समय में आया है जब कुछ हफ्तों पहले ही पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। एक ऐसे पद पर, जिसे संविधान में देश का दूसरा सबसे बड़ा पद माना गया है, एक अनुभवी और सर्व-स्वीकार्य व्यक्ति का चुनाव करना एक बड़ी जिम्मेदारी थी। और इस जिम्मेदारी के लिए बीजेपी ने एक ऐसे चेहरे को चुना, जो शायद आम जनता के लिए उतना परिचित न हो, लेकिन सियासी गलियारों में जिसका नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है।

आइए, इस फैसले की गहराई में उतरें और जानें कि कौन हैं सीपी राधाकृष्णन, उनकी उम्मीदवारी के पीछे क्या राजनीतिक गणित है, और यह चुनाव भारतीय राजनीति के लिए क्या मायने रखता है।

तमिलनाडु के तिरुपुर से दिल्ली तक का सफर और एक सादगी भरा व्यक्तित्व

चंद्रपुरम पोन्नुस्वामी राधाकृष्णन, जिन्हें हम सीपी राधाकृष्णन के नाम से जानते हैं, तमिलनाडु के तिरुपुर जिले से आते हैं। उनकी पहचान एक ऐसे राजनेता की है, जिसने दशकों तक बिना किसी विवाद के जनसेवा की है। 

1957 में जन्मे राधाकृष्णन का राजनीतिक सफर बहुत कम उम्र में ही शुरू हो गया था। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के एक निष्ठावान कार्यकर्ता रहे हैं और भारतीय जनसंघ के दिनों से ही पार्टी से जुड़े हुए हैं।

वे दो बार कोयंबटूर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए हैं – 1998 और 1999 में। यह उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है, क्योंकि तमिलनाडु जैसे राज्य में, जहाँ द्रविड़ पार्टियों का वर्चस्व है, बीजेपी का सांसद बनना कोई आसान बात नहीं है। उन्होंने तमिलनाडु में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में भी काम किया है, जहाँ उन्होंने एक 93-दिन की ‘रथ यात्रा’ निकाली थी। इस यात्रा का उद्देश्य सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक था, जिसमें नदी जोड़ो परियोजना, आतंकवाद विरोधी अभियान और छुआछूत उन्मूलन जैसे मुद्दों पर जागरूकता फैलाई गई थी।

राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल भी बेहद सफल और शांत रहा। उन्होंने झारखंड के राज्यपाल के रूप में अपनी सेवाएँ दीं और हाल ही में महाराष्ट्र के राज्यपाल बने थे, साथ ही उन्हें तेलंगाना और पुडुचेरी का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया था। अपने इन सभी पदों पर, उन्होंने एक गैर-विवादास्पद और संवैधानिक प्रमुख की भूमिका निभाई, जिससे उनकी छवि एक सुलझे हुए और शांत व्यक्ति की बनी है। इसी छवि ने उन्हें उपराष्ट्रपति पद के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार बनाया है।

बीजेपी का बदला हुआ ‘टेंप्लेट’

राधाकृष्णन के नाम की घोषणा के साथ ही सबसे बड़ी चर्चा यह शुरू हो गई कि बीजेपी ने जगदीप धनखड़ के ‘टेंप्लेट’ को क्यों बदला? पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ अपने कार्यकाल के दौरान विपक्ष के साथ मुखर टकराव के लिए जाने जाते थे। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में भी उनका कार्यकाल ममता बनर्जी सरकार के साथ लगातार विवादों में रहा था। यह एक ऐसा ‘टेंप्लेट’ था, जिसमें संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति भी राजनीतिक रूप से मुखर था।

लेकिन सीपी राधाकृष्णन का व्यक्तित्व इससे बिल्कुल विपरीत है। वे बातचीत में विनम्र, शांत और सुलझे हुए माने जाते हैं। उनका ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि उन्होंने राज्यपाल रहते हुए कभी भी राज्य सरकारों के साथ टकराव की स्थिति पैदा नहीं की। यह एक ऐसा फैसला है जो दर्शाता है कि बीजेपी अब देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद पर एक ऐसे व्यक्ति को चाहती है, जो राज्यसभा का संचालन शांति और सद्भाव के साथ कर सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि बीजेपी ने यह फैसला इसलिए भी लिया है ताकि संसद के उच्च सदन, राज्यसभा में विपक्ष के साथ अनावश्यक टकराव से बचा जा सके। राधाकृष्णन की विनम्रता और उनका राजनीतिक अनुभव उन्हें यह जिम्मेदारी बखूबी निभाने में मदद करेगा। यह ‘शांतिपूर्ण’ चुनाव बीजेपी के लिए न सिर्फ एक जीत है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि पार्टी संवैधानिक पदों को लेकर गंभीर है और किसी भी तरह के राजनीतिक विवाद से बचना चाहती है।

दक्षिण भारत का सियासी समीकरण

राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाना सिर्फ उनकी योग्यता या व्यक्तित्व को देखकर नहीं लिया गया है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा राजनीतिक समीकरण भी छिपा है। यह फैसला बीजेपी की ‘दक्षिण भारत’ में अपनी पैठ बनाने की रणनीति का एक हिस्सा है।

  1. तमिलनाडु पर नजर: तमिलनाडु में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। सीपी राधाकृष्णन को इस पद पर बैठाकर बीजेपी तमिलनाडु के वोटरों को एक सकारात्मक संदेश देना चाहती है। वे कोंगु वेल्लला गौंडर समुदाय से आते हैं, जो तमिलनाडु के पश्चिमी हिस्से में एक प्रभावशाली समुदाय है। बीजेपी को उम्मीद है कि उनके नाम से पार्टी को इस क्षेत्र में मजबूती मिलेगी।हिंदी विरोधी छवि से मुकाबला
  2. तमिलनाडु में बीजेपी पर हिंदी थोपने का आरोप लगता रहा है। एक तमिल नेता को उपराष्ट्रपति जैसे बड़े पद पर बैठाना इस आरोप का जवाब देने का एक सशक्त तरीका है।
  3. जातीय समीकरण: ओबीसी समुदाय से आने वाले राधाकृष्णन का चयन बीजेपी के उस बड़े सामाजिक ताने-बाने को साधने का प्रयास है, जिसमें हर समुदाय को प्रतिनिधित्व देने की बात कही जाती है।

यह कदम बीजेपी के ‘लुक साउथ’ (Look South) अभियान को भी बल देता है, जिसकी शुरुआत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के चुनाव से हुई थी, जो कि ओडिशा से आती हैं। अब दक्षिण भारत के एक नेता को उपराष्ट्रपति बनाकर बीजेपी ने यह साफ कर दिया है कि वह क्षेत्रीय और भाषाई सीमाओं को तोड़कर पूरे देश में अपना आधार बढ़ाना चाहती है।

चुनाव का गणित

भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव एक इलेक्टोरल कॉलेज द्वारा किया जाता है, जिसमें संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी सांसद शामिल होते हैं। इसमें राज्य विधानसभाओं के सदस्य शामिल नहीं होते।

मौजूदा संसद में, एनडीए के पास पूर्ण बहुमत है। लोकसभा और राज्यसभा के कुल 788 सांसदों में से, एनडीए के पास अकेले 400 से अधिक सांसदों का समर्थन है। ऐसे में, सीपी राधाकृष्णन की जीत लगभग तय मानी जा रही है। विपक्ष भी अभी तक अपना उम्मीदवार तय नहीं कर पाया है और कई विपक्षी नेताओं ने राधाकृष्णन के नाम का स्वागत किया है।

राजनाथ सिंह जैसे वरिष्ठ बीजेपी नेताओं ने विपक्षी दलों के नेताओं से भी समर्थन मांगा है, जिसमें नीतीश कुमार (जेडीयू) का समर्थन मिल चुका है। यह दर्शाता है कि बीजेपी इस चुनाव को सर्वसम्मति से जीतना चाहती है, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि राधाकृष्णन सिर्फ एनडीए के नहीं, बल्कि पूरे देश के उपराष्ट्रपति हैं।

अंत में, सीपी राधाकृष्णन का उपराष्ट्रपति बनना सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं है। यह एक ऐसे विनम्र और समर्पित नेता की कहानी है, जिसने चुपचाप अपना काम किया और अंततः देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद पर पहुँचकर अपनी सादगी और अनुभव का लोहा मनवाया। यह उन लोगों के लिए भी एक प्रेरणा है जो मानते हैं कि राजनीति में विनम्रता और ईमानदारी से भी सफलता हासिल की जा सकती है।

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