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भारतीय शतरंज की युवा शक्ति का उदय – कोनेरू हम्पी को हराकर दिव्या देशमुख ने जीता FIDE महिला विश्व कप

भारतीय शतरंज, जिसकी जड़ें सदियों पुरानी हैं, आज एक नए स्वर्णिम युग में प्रवेश कर रहा है। कभी विश्वनाथन आनंद जैसे दिग्गज खिलाड़ियों ने इस खेल को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित किया, और अब युवा प्रतिभाएं नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। इस श्रंखला में सबसे नया और सबसे चमकदार नाम है 19 वर्षीय दिव्या देशमुख (Divya Deshmukh) का, जिन्होंने जॉर्जिया के बटुमी में आयोजित फिडे महिला विश्व कप 2025 (FIDE Women’s World Cup 2025) का खिताब जीतकर इतिहास रच दिया है। यह सिर्फ एक जीत नहीं, बल्कि भारतीय महिला शतरंज के लिए एक मील का पत्थर है, क्योंकि इस जीत के साथ ही दिव्या भारत की चौथी महिला ग्रैंडमास्टर (Grandmaster – GM) भी बन गई हैं!

Courtesy – The Indian Express

 

जब भारत की दो शेरनियां भिड़ीं

फिडे महिला विश्व कप का फाइनल मुकाबला बेहद रोमांचक रहा। यह मुकाबला किसी विदेशी खिलाड़ी से नहीं, बल्कि भारत की ही एक और दिग्गज, अनुभवी ग्रैंडमास्टर कोनेरू हम्पी (Koneru Humpy) से था। यह पहला मौका था जब FIDE महिला विश्व कप के फाइनल में दो भारतीय खिलाड़ी आमने-सामने थीं, जिसने इस मुकाबले को और भी खास बना दिया था। बटुमी, जॉर्जिया में 5 से 29 जुलाई, 2025 तक चले इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट का फाइनल, शतरंज प्रेमियों के लिए एक यादगार भिड़ंत थी।

दिव्या देशमुख ने अपनी आक्रामक और साहसिक चालों से सभी को प्रभावित किया। फाइनल मुकाबला क्लासिकल गेम्स के बाद रैपिड टाईब्रेक (Rapid Tiebreak) में गया, जहाँ दिव्या ने अपनी तेज़ सोच और सटीक चालों से कोनेरू हम्पी को मात दी। यह पल भारतीय शतरंज के इतिहास में दर्ज हो गया, जब एक युवा खिलाड़ी ने अपनी ही दिग्गज को हराकर विश्व कप का खिताब अपने नाम किया। इससे पहले सेमीफाइनल में भी दिव्या ने चीन की पूर्व विश्व चैंपियन तान झोंगयी (Tan Zhongyi) को 1.5-0.5 के अंतर से हराकर फाइनल में जगह बनाई थी, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी।

Courtesy – Deccan Herald

 

दिव्या का सफर

नागपुर, महाराष्ट्र में 9 दिसंबर 2005 को जन्मी दिव्या देशमुख ने सिर्फ पांच साल की उम्र में शतरंज की बिसात पर अपनी चालें चलना शुरू कर दिया था। उनके माता-पिता, डॉ. जितेंद्र और डॉ. नम्रता, दोनों पेशे से डॉक्टर हैं, लेकिन उन्होंने अपनी बेटी के शतरंज के जुनून को पूरा समर्थन दिया। दिव्या की प्रतिभा बचपन से ही ज़ाहिर होने लगी थी, और उन्होंने बहुत कम उम्र में ही कई खिताब अपने नाम कर लिए।

  • 2012: मात्र 7 साल की उम्र में अंडर-7 नेशनल चैंपियनशिप जीती।
  • 2013: सबसे कम उम्र की वुमन फिडे मास्टर (Woman FIDE Master – WFM) बनीं।
  • 2014: डरबन में अंडर-10 विश्व युवा खिताब जीता।
  • 2017: ब्राजील में अंडर-12 विश्व युवा खिताब अपने नाम किया।
  • 2020: फिडे ऑनलाइन शतरंज ओलंपियाड में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय टीम का हिस्सा रहीं।
  • 2021: भारत की 21वीं महिला वुमन ग्रैंडमास्टर (WGM) बनीं।
  • 2022: भारतीय महिला शतरंज चैंपियनशिप जीती।
  • 2023: इंटरनेशनल मास्टर (International Master – IM) का खिताब हासिल किया और एशियाई महिला शतरंज चैंपियनशिप जीती।
  • 2024: फिडे विश्व अंडर-20 गर्ल्स शतरंज चैंपियन बनीं, जो उनका तीसरा विश्व खिताब था। इसी साल उन्होंने 45वें शतरंज ओलंपियाड में भी भारत को स्वर्ण पदक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

दिव्या की सबसे यादगार जीतों में से एक 2025 में लंदन में हुई विश्व ब्लिट्ज टीम शतरंज चैंपियनशिप के सेमीफाइनल में दुनिया की नंबर 1 खिलाड़ी हाउ यिफान (Hou Yifan) को हराना भी था। इस जीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने भी दिव्या की प्रशंसा की थी, जो उनके असाधारण कौशल का प्रमाण है। दिव्या के कोच, ग्रैंडमास्टर आर.बी. रमेश (GM R.B. Ramesh) ने उनकी तेज सामरिक दृष्टि, अटूट धैर्य और रचनात्मक प्रतिभा को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

शतरंज की सबसे बड़ी जंग

फिडे महिला विश्व कप शतरंज कैलेंडर के सबसे प्रतिष्ठित टूर्नामेंटों में से एक है। यह एक नॉकआउट प्रारूप (Knockout Format) में खेला जाता है, जहां हारने वाला खिलाड़ी टूर्नामेंट से बाहर हो जाता है। इस टूर्नामेंट में दुनिया भर की शीर्ष महिला खिलाड़ी हिस्सा लेती हैं, और इसे जीतना किसी भी शतरंज खिलाड़ी के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जाता है।

इस विश्व कप को जीतने का मतलब सिर्फ एक ट्रॉफी उठाना नहीं होता। इसका सीधा मतलब होता है शतरंज की दुनिया में अपनी स्थिति को मज़बूत करना और भविष्य के बड़े टूर्नामेंटों के लिए क्वालिफाई करना। दिव्या की इस जीत ने उन्हें महिला कैंडिडेट्स टूर्नामेंट 2026 (Women’s Candidates Tournament 2026) में जगह दिला दी है। कैंडिडेट्स टूर्नामेंट वह मंच है, जहाँ से महिला विश्व चैंपियन (Women’s World Champion) को चुनौती देने वाले का चयन होता है। यह दिव्या के लिए विश्व चैंपियन बनने की दिशा में एक और बड़ा कदम है।


टूर्नामेंट के दौरान दिव्या ने कई उच्च रैंकिंग वाले खिलाड़ियों को हराया, जिनमें चौथे वरीयता प्राप्त कोनेरू हम्पी (फाइनल), दूसरे वरीयता प्राप्त झू जिनर (चौथे दौर में), दसवें वरीयता प्राप्त हरिका द्रोणावल्ली (क्वार्टरफाइनल), और तीसरे वरीयता प्राप्त तान झोंगयी (सेमीफाइनल) शामिल हैं। यह उनके निडर और आक्रामक खेल का प्रमाण है।

दिव्या का व्यक्तित्व और प्रेरणा

दिव्या देशमुख सिर्फ एक असाधारण शतरंज खिलाड़ी नहीं हैं, बल्कि उनका व्यक्तित्व भी प्रेरणादायक है। वह दबाव में शांत रहती हैं और अपनी आक्रामक खेल शैली के लिए जानी जाती हैं। उनकी निरंतर प्रगति और कड़ी मेहनत ने उन्हें कम उम्र में ही वैश्विक पहचान दिलाई है।


दिव्या की सफलता भारतीय महिला शतरंज के लिए एक उज्जवल भविष्य का संकेत है। कोनेरू हम्पी और हरिका द्रोणावल्ली जैसी खिलाड़ियों ने पहले ही भारतीय महिला शतरंज को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है, और अब दिव्या देशमुख जैसी युवा प्रतिभाएं इस विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। यह जीत भारत को वैश्विक शतरंज मानचित्र पर एक प्रमुख शक्ति के रूप में और भी मज़बूत करती है।

इस जीत पर पूरे भारतीय शतरंज समुदाय, खेल मंत्रालय और आम जनता से बधाइयों का तांता लगा हुआ है। दिव्या की यह उपलब्धि युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा है कि कड़ी मेहनत, लगन और सही मार्गदर्शन से किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल की जा सकती है। भारत में शतरंज की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है, और दिव्या जैसी युवा चैंपियन इस खेल को और भी अधिक बच्चों तक पहुंचाने में मदद करेंगी।

भारतीय शतरंज का स्वर्णिम युग

दिव्या देशमुख का फिडे महिला विश्व कप जीतना भारतीय शतरंज के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत है। वह अब विश्व चैंपियन बनने के अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं, और उनकी यह जीत उस दिशा में एक बड़ा कदम है। भारत में शतरंज की अकादमी और प्रशिक्षण में लगातार सुधार हो रहा है, जिससे नई प्रतिभाएं उभर रही हैं।

दिव्या की कहानी हमें बताती है कि कैसे एक छोटे शहर की लड़की, अपनी लगन और प्रतिभा से, शतरंज की दुनिया के शीर्ष पर पहुंच सकती है। यह सिर्फ एक खेल की जीत नहीं, बल्कि सपनों को पूरा करने, चुनौतियों का सामना करने और देश को गौरव दिलाने की कहानी है। दिव्या देशमुख का नाम अब भारतीय शतरंज के इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गया है, और हम सभी उनकी भविष्य की उपलब्धियों का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं।

यह जीत सिर्फ दिव्या की नहीं, बल्कि हर उस भारतीय बच्चे की है जो 64 खानों की दुनिया में अपने सपनों को पंख देना चाहता है। भारतीय शतरंज का स्वर्णिम युग अभी शुरू हुआ है!

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