हाल के दिनों में इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने मध्य-पूर्व में एक बार फिर से उथल-पुथल मचा दी है। इस संघर्ष के बीच, लगभग 10,000 भारतीय, जिनमें करीब 6,000 छात्र हैं, ईरान के विभिन्न शहरों—तेहरान, उरमिया, शिराज, इस्फ़हान, क़ुम और यज़्द—में फंसे हुए हैं।
भरतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने एम्बेसी-कंट्रोल-रूम सक्रिय किया, हेल्पलाइन नंबर जारी किए, और औपचारिक तौर पर मार्गदर्शन जारी किया कि जो भी भारतीय अपने निजी साधनों से आ – जा सकते हैं, वे सुरक्षित स्थानों की ओर बढ़ें।

कौन-कहां है और क्या स्थिति है?
- अभी तक तेहरान सबसे ज़्यादा चुनौतियों वाला शहर रहा है—यहां तेल के स्टेशनों पर कतारें और नागरिक में भय का माहौल है ।
- उरमिया से लगभग 100 छात्र दिनांक 17 जून की शाम तक आर्मेनिया के नॉर्डुज बॉर्डर तक सुरक्षित पहुँच गए।
- इस्फ़हान, शिराज, क़ुम, यज़्द इन शहरों में छात्रों को धीरे-धीरे एकत्रित कर आर्मेनिया के राजमार्ग की ओर निकाला जा रहा।
विदेश मंत्रालय ने बताया कि टोल-फ्री हेल्पलाइन +91‑11‑23012113, +91‑11‑23014104 और +91‑11‑23017905 से शुरू है, वहीं एम्बेसी-तेहरान में +98‑9128109115 आदि नंबर 24×7 उपलब्ध हैं।
कैसे रवाना हो रहे भारतीय?
इसके पीछे रणनीतिक रूप से एंटी-पैटर्न भारतीय Think Tanks ने चुना है, ईरानी हवाई क्षेत्र लगभग बंद है, जबकि कुछ कन्वेनिएंट रास्ते ठीक बैठ नहीं रहे हैं। ऐसे में भारत ने चुना भूमि मार्ग + हवाई मार्ग का संयोजन।
क्यों चुना गया आर्मेनिया?
- भौगोलिक निकटता: नॉर्डुज़ बॉर्डर ईरान के उत्तर-पश्चिम में प्रमुख शहरों से करीब और सहज है।
- राजनीतिक स्थिरता: आर्मेनिया भारत का मित्र देश है—दोनों के स्थिर, राजनीतिक, और रक्षा-संबंधी संबंध हैं ।
- बिना विवाद की सीमाएँ: पाकिस्तान, इराक और तुर्की की तरह कोई तनाव या विवाद नहीं है।
- विमान-आधारित समाधान: Yerevan Airport पूरी तरह खुले और संचालन योग्य हैं।
आंकड़े क्या कहते हैं?
- प्रवासी संख्या: लगभग 10,000 भारतीय, जिनमें करीब 6,000 छात्र।
- उरमिया से बॉर्डर पार लगभग 100 छात्र; इनमें से 90 कश्मीरी छात्र शामिल ।
- पहले बैच में पहुँचा 110 छात्रों का ग्रुप जो अगली सुबह दिल्ली के लिए उड़ान भरेगा ।
इजरायल–ईरान संघर्ष की पृष्ठभूमि
- यह संघर्ष कई दिनों से चल रहे एयर-स्ट्राइक और मिसाइल हमलों के चलते हुआ, जिसमें इजराइल ने ईरानी सैन्य और परमाणु इन्फ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया—ईरान ने ड्रोन और मिसाइल के जरिए जवाबी हमला किया है।
- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तेहरान के तत्कालीन नागरिकों को तेहरान छोड़ने की अपील की है।
- वैश्विक नेता और G7 सदस्य देशों ने संघर्ष को सीमित करने व इज़राइल के आत्मरक्षा राष्ट्रीय अधिकार का समर्थन किया, पर साथ ही क्षेत्र में एस्केलेशन की चिंता व्यक्त की ।

- क्या भारत की प्रतिक्रिया उपयुक्त रही?
- MEA की तत्परता: सुरक्षा संकट बढ़ते ही भारत ने तत्काल कन्ट्रोल रूम, एम्बेसी हेल्पलाइन, और माइग्रेशन फ्री ज़ोन तैयार किया ।
- राजनयिक संचालन: विदेश मंत्री जयशंकर ने आर्मेनियाई समकक्ष से बातचीत की और UAE समेत कई देशों से भी विकल्प तलाशे ।
- विद्यार्थी एवं नागरिक सुरक्षा की प्राथमिकता: एयरस्टाइज व स्पीड से दूसरे शहरों में शिफ्टिंग और बॉर्डर ट्रांसपोर्ट सुनिश्चित हुआ।
छात्रों की जुबानी
जब संकट आता है, तो मानवीय जज़्बा और एकता की ताकत सबसे बड़ी उम्मीद बनती है।तेहरान में फंसी एक भारतीय छात्रा ने बताया, “हमें लगातार धमाके सुनाई दे रहे थे। घर से दूर, इतनी अनिश्चितता में रहना बहुत डरावना था। लेकिन भारतीय एम्बेसी ने हमें जो भरोसा दिया, उससे हम मज़बूती का एहसास कर रहे हैं ।”
कश्मीर से ताल्लुक रखने वाले एक छात्र ने कहा, “उरमिया से बॉर्डर तक का सफर थकाने वाला था, लेकिन जैसे ही हमने आर्मेनिया की धरती पर कदम रखा, लगा जैसे जान बच गई।”
एक मेडिकल स्टूडेंट ने फेसबुक पर लिखा, “हमारे प्रोफेसर्स ने भी साथ दिया, लेकिन आखिरकार हमारी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी भारत सरकार ने जिस तरह निभाई, वह गर्व की बात है।”
भारत, ईरान और इज़राइल
भारत की नीति हमेशा से संतुलित रही है।
- ईरान से ऐतिहासिक ऊर्जा सहयोग: भारत कई सालों से ईरान से तेल आयात करता रहा है, और चाहबहार पोर्ट के ज़रिए अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया से कनेक्टिविटी बनाए रखने की कोशिश में है।
- इज़राइल से सामरिक साझेदारी: डिफेंस, एग्रीटेक और साइबर सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों में भारत-इज़राइल संबंध बहुत गहरे हैं।
- दोनों के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती रही है, और इस बार MEA ने सावधानी से दोनों से संपर्क में रहकर छात्रों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी।
वैश्विक प्रतिक्रिया और भारत की भूमिका
- अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देश इज़राइल के समर्थन में दिखे, लेकिन भारत ने “सभी पक्षों से संयम की अपील” की।
- संयुक्त राष्ट्र में भारत ने “शांति और स्थिरता” बनाए रखने का आह्वान किया।
- इस संकट के दौरान भारत की भूमिका शांतिदूत जैसी रही, जिसने न केवल अपने नागरिकों की सुरक्षा की, बल्कि वैश्विक तनाव को भी बढ़ावा नहीं दिया।
मीडिया, सोशल नेटवर्क और ज़मीन की सच्चाई
सोशल मीडिया पर कई झूठे वीडियो, गलत मैसेज और पैनिक फैलाने वाली खबरें वायरल हुईं।
- कई भारतीय छात्रों को गलत जानकारी मिली कि दिल्ली से प्लेन भेजा जा रहा है, जबकि हकीकत में रास्ता आर्मेनिया से निकाला गया।
- इस संकट ने एक बार फिर सरकारी घोषणाओं पर भरोसे की ज़रूरत को सिद्ध कर दिखा दिया।
- मंत्रालय और दूतावासों ने ट्विटर, फेसबुक और टेलीग्राम चैनल के ज़रिए लाइव अपडेट देकर यह साबित किया कि डिजिटल डिप्लोमेसी कितनी कारगर हो सकती है।
भविष्य की तैयारी और सबक
यह संकट भारत के लिए कई सबक छोड़ गया:
- विदेश में रहने वाले छात्रों और नागरिकों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य हो ताकि किसी भी इमरजेंसी में सरकार के पास आंकड़े मौजूद हों।
- एंबेसीज़ को और मजबूत बजट और ट्रेन्ड स्टाफ दिया जाए, ताकि वो युद्ध जैसी स्थिति में भी लोगों को निकाल सकें।
- इमरजेंसी ट्रांजिट टाई-अप्स को बढ़ाया जाए—जैसे आर्मेनिया, तुर्कमेनिस्तान, जॉर्जिया जैसे देशों से पूर्व-समझौते हों ताकि एयरलिफ्ट की स्थिति में तेजी लाई जा सके।
निष्कर्ष
ईरान–इज़राइल के संघर्ष ने जहां एक ओर पूरी दुनिया को अस्थिरता के कगार पर ला खड़ा किया, वहीं भारत की सक्रियता और संवेदनशीलता ने एक मिसाल पेश की है।
विदेश मंत्रालय, भारत सरकार और एंबेसी की त्वरित कार्रवाई ने न सिर्फ हज़ारों ज़िंदगियों को बचाया, बल्कि यह भी दिखाया कि भारत अब न सिर्फ एक उभरती शक्ति है, बल्कि अपनों के लिए हमेशा खड़ा रहने वाला देश भी है।
आज जब छात्र अपने घरों में सुरक्षित हैं, जब माता-पिता चैन की नींद सो पा रहे हैं, तब हम कह सकते हैं—
“भारत सिर्फ एक देश नहीं, भरोसे का नाम है।”
