प्रस्तावना
गर्मियों (Summers) के मौसम में एयर कंडीशनर (AC) अब सिर्फ शौक नहीं, बल्कि ज़रूरत बन गया है। जैसे-जैसे तापमान (Temperature) बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे AC की मांग और उपयोग भी बढ़ रहा है। लेकिन इस बढ़ते उपयोग के साथ-साथ बिजली की खपत और पर्यावरण पर प्रभाव को लेकर सरकारें भी चिंतित हैं। यही वजह है कि 2025 में भारत सरकार ने एक नया नियम लागू किया है, जिसके तहत सभी सार्वजनिक और वाणिज्यिक स्थानों पर एसी का तापमान कम से कम 20 – 28 डिग्री सेल्सियस रखना अनिवार्य कर दिया गया है।
नया नियम क्या है?
सरकार द्वारा जारी गाइडलाइन के मुताबिक:
- सभी ऑफिस, मॉल्स, थिएटर, रेस्तरां और बड़े वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों में एयर कंडीशनर का तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं किया जा सकेगा।
- यह नियम अनिवार्य रूप से 1 जुलाई 2025 से लागू होगा।
- नियम का उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना लगाया जाएगा।
यह गाइडलाइन ऊर्जा मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय के संयुक्त सहयोग से तैयार की गई है।
इस नियम के पीछे सरकार का उद्देश्य
सरकार का उद्देश्य साफ है – देशभर में ऊर्जा की खपत को कम करना और पर्यावरण पर दबाव घटाना।
- ऊर्जा की बचत: भारत में एयर कंडीशनर का उपयोग तेजी से बढ़ा है, जिससे बिजली की खपत पर भारी असर पड़ा है। सिर्फ मेट्रो शहरों में ही नहीं, अब छोटे शहरों में भी AC आम होता जा रहा है। इससे ऊर्जा उत्पादन पर दबाव और लागत दोनों बढ़ रहे हैं।
- पर्यावरण संरक्षण: अधिक ऊर्जा उपयोग का मतलब है अधिक कोयला जलाना, जिससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है। इस नियम से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने की उम्मीद की जा रही है।
- स्वास्थ्य का ध्यान: विशेषज्ञों का मानना है कि बहुत ठंडी जगह में लंबे समय तक रहने से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है, खासकर सर्दी-जुकाम, मांसपेशियों में अकड़न और इम्युनिटी कमजोर होना जैसी समस्याएं।
- ऊर्जा की बचत: भारत में एयर कंडीशनर का उपयोग तेजी से बढ़ा है, जिससे बिजली की खपत पर भारी असर पड़ा है। सिर्फ मेट्रो शहरों में ही नहीं, अब छोटे शहरों में भी AC आम होता जा रहा है। इससे ऊर्जा उत्पादन पर दबाव और लागत दोनों बढ़ रहे हैं।

स्वास्थ्य पर असर
24 डिग्री का तापमान इंसानी शरीर के लिए संतुलित और सहज माना जाता है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अनुसार:
- ज्यादा ठंडा तापमान शरीर की प्राकृतिक गर्मी को प्रभावित करता है।
- लंबे समय तक 18-20 डिग्री तापमान में रहने से हड्डियों और मांसपेशियों पर नकारात्मक असर होता है।
- 24 डिग्री पर AC चलाना स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर और सुरक्षित है।
पर्यावरण पर प्रभाव
कम तापमान पर AC चलाने से बिजली की खपत अधिक होती है। उदाहरण के लिए:
- 18 डिग्री तापमान पर चलने वाला एक AC प्रति घंटे लगभग 1.5 यूनिट बिजली खपत करता है।
- वही AC अगर 24 डिग्री पर चले, तो प्रति घंटे सिर्फ 0.8 यूनिट की खपत होती है।
इससे ना सिर्फ बिल कम आएगा, बल्कि पावर प्लांट पर भी कम लोड पड़ेगा और ग्रीनहाउस गैसें भी कम होंगी।
जनता और उद्योगों की प्रतिक्रिया
इस नियम को लेकर जनता की राय मिली-जुली है।
सकारात्मक प्रतिक्रिया:
- कई लोग इसे स्मार्ट और दूरदर्शी कदम मान रहे हैं।
- ऑफिस कर्मचारियों ने कहा कि बहुत ठंडे ऑफिस में काम करना असुविधाजनक होता है, 24 डिग्री आरामदायक रहेगा।
नकारात्मक प्रतिक्रिया:
- मॉल्स और रेस्टोरेंट्स के मालिकों ने कहा कि ग्राहक अक्सर ठंडी जगहों को पसंद करते हैं, 24 डिग्री से कस्टमर का अनुभव प्रभावित हो सकता है।
- कुछ लोग इसे “सरकार का बहुत ज़्यादा हस्तक्षेप” भी मान रहे हैं।
अन्य देशों में क्या होता है?
भारत से पहले कई देशों ने इस तरह के कदम उठाए हैं:
- जापान: “कूल बिज़ प्रोग्राम” के तहत ऑफिसों में AC तापमान 28 डिग्री तक रखने की सिफारिश की गई थी।
- ऑस्ट्रेलिया: 24-26 डिग्री तापमान को सामान्य और उपयुक्त माना गया है।
- अमेरिका: कुछ राज्यों में सार्वजनिक भवनों में 24 डिग्री के आसपास तापमान रखने के नियम हैं।
इससे भारत का नया नियम कोई नया प्रयोग नहीं बल्कि वैश्विक ट्रेंड का हिस्सा है।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
बिजली बिल में राहत:
- 24 डिग्री पर चलने वाले AC कम बिजली खाते हैं, जिससे संस्थानों और घरों दोनों का बिजली बिल घट सकता है।
लंबे समय तक उपकरणों की उम्र बढ़ेगी:
- AC को कम परिश्रम करना पड़ेगा जिससे उसकी उम्र और एफिशिएंसी दोनों में सुधार होगा।
स्वास्थ्य से जुड़ी लागत में कमी:
- ठंडी जगहों में बीमार पड़ने वालों की संख्या में गिरावट आएगी, जिससे मेडिकल खर्च कम होगा।
निष्कर्ष
भारत सरकार का यह निर्णय सिर्फ ऊर्जा बचत नहीं बल्कि पर्यावरण और स्वास्थ्य की दिशा में एक ठोस और जरूरी कदम है। हां, शुरुआत में इस नियम को लेकर थोड़ी परेशानी हो सकती है, लेकिन जैसे-जैसे लोग इसके पीछे की सोच को समझेंगे, ये बदलाव स्वीकार्य और प्रभावी साबित होगा।
AC अब सिर्फ एक ठंडा माहौल देने वाला उपकरण नहीं, बल्कि यह हमारे ऊर्जा संसाधनों और पर्यावरण संतुलन का भी एक अहम हिस्सा बन चुका है। समय की मांग है कि हम सुविधा और जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाएं – और यह नियम उसी दिशा में एक साहसी कदम है।
