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7/11 मुंबई ब्लास्ट केस – न्याय की लंबी लड़ाई और सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर फैसला

11 जुलाई 2006, एक ऐसी तारीख जो मुंबई के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है। शाम का भीड़भाड़ वाला समय, जब लाखों लोग अपने दिनभर की थकान मिटाकर मुंबई की जीवनरेखा कही जाने वाली लोकल ट्रेनों से अपने घरों की ओर लौट रहे थे। तभी अचानक, कुछ ही मिनटों के भीतर, मुंबई की पश्चिमी रेलवे लाइन पर सात अलग-अलग ट्रेनों में एक के बाद एक भीषण धमाके हुए। इन धमाकों ने न सिर्फ स्टील के डिब्बों को मलबे में बदल दिया, बल्कि 188 बेगुनाह जिंदगियों को भी निगल लिया और 800 से ज़्यादा लोगों को हमेशा के लिए ज़ख्मी कर दिया। खार रोड, बांद्रा, जोगेश्वरी, माहिम, मीरा रोड, भायंदर और बोरिवली – ये सिर्फ स्टेशन नहीं थे, बल्कि उस दिन हुई सामूहिक हत्या के गवाह थे। यह तारीख ‘7/11’ के नाम से जानी गई, जो आज भी हर मुंबईकर के ज़हन में एक भयावह टीस बनकर ज़िंदा है।

करीब दो दशक बाद, इस जघन्य अपराध के लिए न्याय की लड़ाई अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच रही है – भारत के सर्वोच्च न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में। हाल ही में, बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) ने 12 दोषियों में से 10 की सज़ा को बरकरार रखा है, जिसके बाद अब इन सभी दोषियों की उम्मीदें और अगली कानूनी कार्यवाही सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े पर आकर टिक गई हैं। यह सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि आतंक के पीड़ितों के लिए दशकों से जारी इंतज़ार और न्याय की उस धीमी, लेकिन अटूट यात्रा का प्रतीक है।

जब लोकल ट्रेनें बन गईं कब्रगाह

11 जुलाई 2006 की शाम 6:24 बजे से 6:35 बजे के बीच, मुंबई ने एक ऐसा मंज़र देखा जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल था। मात्र 11 मिनट के भीतर, चलती हुई लोकल ट्रेनों में आरडीएक्स (RDX) जैसे शक्तिशाली विस्फोटकों का इस्तेमाल कर सीरियल ब्लास्ट किए गए। यह हमला आतंकवादियों की एक सोची-समझी साज़िश का हिस्सा था, जिसका मक़सद देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को दहलाना और सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ना था।

Courtesy – The Indian Express

 

धमाकों की आवाज़ से पूरा शहर थर्रा उठा। ट्रेनों के डिब्बे हवा में उछल गए, स्टील पिघल गया और चारों तरफ धुआं, धूल, और चीख-पुकार का मंज़र था। लोग अपनी जान बचाने के लिए चलती ट्रेन से कूदने लगे। पटरियों पर क्षत-विक्षत शव पड़े थे, तो ट्रेन के अंदर लहूलुहान घायल दर्द से कराह रहे थे। बचाव कार्य तुरंत शुरू हुआ, लेकिन तबाही का पैमाना इतना बड़ा था कि हर आंख नम थी। अस्पताल घायलों से भर गए, और आम लोग भी रक्तदान और मदद के लिए आगे आए। यह मुंबई की ‘स्पिरिट’ थी, जो हर आपदा में एकजुट होकर खड़ी हो जाती है। लेकिन इस घटना ने मुंबई को अंदर तक झकझोर दिया था।

जांच से सज़ा तक का लंबा सफ़र

मुंबई पुलिस की एंटी-टेररिज्म स्क्वाड (Anti-Terrorism Squad – ATS) ने इस मामले की जांच संभाली। यह एक विशाल और जटिल जांच थी, जिसमें सैकड़ों गवाहों के बयान दर्ज किए गए और लाखों दस्तावेज़ खंगाले गए। एटीएस ने अपनी जांच के बाद 13 लोगों को इस साज़िश में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया। 

जांच में सामने आया कि इन धमाकों के पीछे प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (Lashkar-e-Taiba – LeT) और स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (Students Islamic Movement of India – SIMI) जैसे संगठनों का हाथ था।

मामले की सुनवाई के लिए एक विशेष मकोका अदालत (Special MCOCA Court) का गठन किया गया, क्योंकि यह मामला महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (Maharashtra Control of Organised Crime Act – MCOCA) के तहत आता था। ट्रायल 2007 में शुरू हुआ और सालों तक चला, जिसमें कानूनी पेचीदगियां और लंबी बहसें शामिल थीं। अंततः, 2015 में, विशेष अदालत ने अपना फैसला सुनाया। 13 में से 12 आरोपियों को दोषी ठहराया गया, जबकि एक आरोपी, अब्दुल वाहिद शेख, को बरी कर दिया गया।

यह फैसला पीड़ितों के लिए एक बड़ी राहत थी, लेकिन असली चुनौती सज़ा के निर्धारण की थी। अदालत ने 5 दोषियों – एहतेशाम सिद्दीकी (Ehtesham Siddiqui), आसिफ खान (Asif Khan), फैसल शेख (Faisal Shaikh), नवीद हुसैन खान (Naveed Hussain Khan) और कमल अहमद अंसारी (Kamal Ahamed Ansari) – को मौत की सज़ा (Death Sentence) सुनाई। वहीं, 7 अन्य दोषियों – तनवीर अहमद (Tanvir Ahmed), मोहम्मद अली (Mohammad Ali), साजिद मंसूरी (Sajid Mansuri), मुज़्ज़म्मिल शेख (Muzzammil Shaikh), जमीर शेख (Zamir Shaikh), सोहेल महमूद शेख (Sohail Mehmood Shaikh) और डी. अब्दुल शेख (D. Abdul Shaikh) – को उम्रकैद (Life Imprisonment) की सज़ा दी गई।

बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला

विशेष मकोका अदालत के फैसले के खिलाफ, सभी दोषी बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) में अपील करने पहुंचे। यह कानूनी प्रक्रिया का एक अनिवार्य हिस्सा है, जहां निचले अदालत के फैसलों की समीक्षा की जाती है। सालों तक हाई कोर्ट में भी इस मामले की सुनवाई चली, जिसमें वकीलों ने अपनी दलीलें पेश कीं और सबूतों पर फिर से विचार किया गया।

और अब, 22 जुलाई 2025 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस बहुचर्चित मामले में अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने 12 में से 10 दोषियों के खिलाफ विशेष अदालत के फैसले को बरकरार रखा है, यानी उनकी दोषी करार दिए जाने और दी गई सज़ा को सही ठहराया है। यह पीड़ितों और महाराष्ट्र सरकार (जो इस मामले में अभियोजन पक्ष है) के लिए एक बड़ी जीत है।

हालांकि, हाई कोर्ट ने दो दोषियों की सज़ा में कुछ बदलाव किए हैं- 

  • जिन 5 को निचली अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई थी, उनमें से नवीद हुसैन खान (Naveed Hussain Khan) की मौत की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया (Commuted to Life Imprisonment) गया है।
  • जिन 7 को उम्रकैद की सज़ा मिली थी, उनमें से डी. अब्दुल शेख (D. Abdul Shaikh) की उम्रकैद की सज़ा को घटाकर 10 साल की कैद (10 Years Imprisonment) कर दिया गया है।


यह फैसला दर्शाता है कि भारतीय न्यायपालिका हर सबूत और हर पहलू पर गंभीरता से विचार करती है, भले ही इसमें कितना भी समय लगे। हाई कोर्ट के इस फैसले ने अब इस मामले को न्याय की अंतिम सीढ़ी – सुप्रीम कोर्ट – तक पहुंचा दिया है।

Courtesy – Aaj Tak

 

अंतिम फैसले का इंतज़ार

बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के बाद, जिन दोषियों की सज़ा बरकरार रखी गई है, उनके पास अब सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का विकल्प है। यह तय है कि वे सभी इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। सुप्रीम कोर्ट में यह मामला अब एक नई लड़ाई का गवाह बनेगा, जहां दोषियों के वकील विभिन्न कानूनी बिंदुओं पर बहस करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट में बहस के मुख्य बिंदु संभवत ये हो सकते हैं – 

मकोका के तहत बयान (Confessional Statements under MCOCA): मकोका के तहत पुलिस के सामने दिए गए इकबालिया बयानों को सबूत के तौर पर स्वीकार किया जाता है, जो सामान्य कानूनों में नहीं होता। बचाव पक्ष अक्सर इन बयानों की वैधता पर सवाल उठाता रहा है।

  • सबूतों की प्रामाणिकता (Authenticity of Evidence): अन्य सबूतों, जैसे फोरेंसिक रिपोर्ट, कॉल डेटा रिकॉर्ड (CDR), और गवाहों के बयानों की प्रामाणिकता पर भी फिर से विचार किया जा सकता है।
  • व्यक्तिगत भूमिका और साज़िश (Individual Role and Conspiracy): बचाव पक्ष यह तर्क दे सकता है कि सभी दोषियों की भूमिका एक जैसी नहीं थी, या उन्हें साज़िश में शामिल होने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे।
  • प्रक्रियात्मक त्रुटियां (Procedural Lapses): सुनवाई के दौरान हुई किसी भी कथित प्रक्रियात्मक त्रुटि को भी उठाया जा सकता है।

महाराष्ट्र सरकार, जिसका प्रतिनिधित्व अक्सर राज्य के गृह मंत्री और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) जैसे वरिष्ठ नेता करते रहे हैं, ने हमेशा इस मामले में दोषियों को कड़ी सज़ा दिलाने की वकालत की है। फडणवीस ने पहले भी आतंक के मामलों में सख्त रुख अपनाया है और राज्य सरकार निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट में भी हाई कोर्ट के फैसले का बचाव करेगी। यह मामला सिर्फ न्याय का नहीं, बल्कि राज्य की आतंकवाद से लड़ने की प्रतिबद्धता का भी प्रतीक है।

Courtesy – The Economic Times

 

पीड़ितों की कसक और न्याय की उम्मीद

इस पूरे कानूनी संघर्ष के बीच, सबसे महत्वपूर्ण वे लोग हैं जिन्होंने इस त्रासदी में अपने प्रियजनों को खोया या गंभीर रूप से घायल हुए। 7/11 के पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए, यह एक अंतहीन इंतज़ार रहा है। हर नई सुनवाई, हर नया फैसला उन्हें उस दर्दनाक दिन की याद दिलाता है। न्यायपालिका की प्रक्रिया धीमी हो सकती है, लेकिन यह सुनिश्चित करती है कि हर पहलू पर विचार हो। पीड़ितों के लिए, सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला ही वह बिंदु होगा जब उन्हें लगेगा कि अंततः न्याय हुआ है।

यह मामला भारत में आतंकवाद से जुड़े मामलों में न्याय वितरण प्रणाली की जटिलताओं को भी उजागर करता है। ऐसे मामलों में सबूत इकट्ठा करना, गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और लंबी कानूनी लड़ाई लड़ना एक बड़ी चुनौती होती है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल इस विशिष्ट मामले के लिए नज़ीर बनेगा, बल्कि भविष्य में आतंकवाद से संबंधित मामलों की सुनवाई और उन्हें सुलझाने के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा भी प्रदान करेगा।

अंत में, 7/11 मुंबई ट्रेन ब्लास्ट केस भारतीय इतिहास में एक काला अध्याय है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला, भले ही आने में समय लगे, उन सभी बेगुनाह लोगों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी जिन्होंने अपनी जान गंवाई और उन सभी के लिए एक उम्मीद की किरण होगी जो दशकों से न्याय का इंतज़ार कर रहे हैं। यह सिर्फ एक फैसला नहीं होगा, बल्कि कानून के शासन और आतंकवाद के खिलाफ भारत की अटूट प्रतिबद्धता का एक प्रतीक होगा।

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